संस्कृत में थाट का अर्थ है मेल। थाट, यह रागों के वर्गीकरण हेतु तैयार की हुई पद्धति है। पंडित विष्णु
नारायण भातखंडे ने १० थाट प्रचिलित किये जिनको कोमल, शुद्ध और तीव्र स्वरों के
आधार पर बनाया गया जो निम्न हैं - (१) कल्याण (२) बिलावल (३) खमाज (४) भैरव (५)
पूर्वी (६) मारवा (७) काफी (८) आसावरी (९) भैरवी (१०) तोड़ी। उपरोक्त राग पद्धति
प्रचलन में होते हुए भी आज बहुत से ऐसे राग हैं जो इन थाटों के खांचों में नहीं
बैठते। अतः कुछ विद्वान इन्हें नकारते हुए रागांग पद्धति अर्थात राग वाचक स्वर
समूह तथा उसके आरोह अवरोह को ही मान्यता देते हैं।
राग एक माहौल या वातावरण विशेष का नाम है जो रंजक
भी है। स्पष्ट रूप से इस वातावरण निर्मिती के केंद्र में वह स्वरावली है जो रागवाचक
है इसे रागांग कहते हैं। इस रागांग का केंद्र बिंदु होता है वादी स्वर। इसे राग का
जीव या प्राण स्वर भी कहा गया है। राग को राज्य की संज्ञा देकर वादी स्वर को उसका
राजा कहा जाता है। स्पष्टतः वादी का प्रयोग अन्य स्वरों की अपेक्षा सर्वाधिक होता
है तथा इस पर ठहराव भी अधिक होता है।
यह सर्वविदित है की एक सप्तक में दो भाव पैदा होते
हैं - षड्ज-पंचम (सा-प) व षड्ज-मध्यम (सा-म) भाव। इस परिपेक्ष्य में यदि वादी स्वर
पूर्वांग में है तो उसका, उस स्वर से संवाद करने वाला, उक्त दोनों भावों में से किसी एक भाव में (किसी निश्चित राग के
अनुसार), उत्तरांग में एक स्वर जरूर होगा जो सप्तक के दोनों
अंगों (पूर्वांग या उत्तरांग) को संतुलित कर राग की रंजकता में वृद्धि करने में
सहायक होगा। इस स्वर को संवादी स्वर कहते हैं। वादी और संवादी स्वर पूर्वांग और
उत्तरांग की तुलना पर समान वज़न के होने चाहिए तभी राग स्वरुप शुद्ध शास्त्रीय और
रस स्रोत बहाने में समर्थ होगा।
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