Sunday, October 29, 2017

सुर की समझ

सुर की समझ गायकी के लिए बहुत जरूरी है. आईये हम सुर की प्राथमिक जानकारी हासिल करते हैं.

स्वर
आवाज़ की एक निर्धारित तेजी और चढ़ाव को स्वर बोलते हैं. स्वर को आम बोलचाल की भाषा में सुर भी कहते हैं.

सप्तक
संगीत में सबसे पहली बात हम सीखते है कि संगीत में कुल सात सुर होते हैं. ये सात सुर सब तरह के संगीत के लिए, चाहे गाने के लिए या बजाने के लिए, सबसे बुनियादी इकाई हैं. इन सात सुरों को तरह तरह के क्रम में लगा कर राग बनते हैं. सात सुरों के इस समूह को सप्तक कहते हैं. सात सुर ये हैं: 

  1. स -  षडज
  2. रे - ऋषभ
  3. ग - गंधार
  4. म - मध्यम
  5. प - पंचम
  6. ध - धैवत 
  7. नी - निषाद
रे स्वर स से ज्यादा तीव्र है. इसी तरह से ग स्वर रे से ज्यादा तीव्र है. तीव्रता का मतलब यहाँ आवाज़ में जोर या ताक़तवर होने से नहीं है.  तीव्र का मतलब हुआ आवाज़ ज्यादा चढ़ी हुई, ऊंची frequency की या फिर जिसे ऊँची pitch की आवाज़ भी कहते हैं. तो इस तरह से सप्तक में स से लेकर नी तक स्वर तीव्रता में लगातार बढ़ते जाते हैं जब की आवाज़ की ताक़त सारे सुरों में एक समान ही रहनी चाहिए. किसी स्वर में कम किसी में ज्यादा ताकत नहीं लगनी चाहिए. एक बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्यूंकि बिना तैयार किये गले में ज्यादातर चढ़े हुए सुर जैसे पंचम, धैवत या फिर निषाद गाने में बहुत ज्यादा ताकत लगती है जबकी एक अभ्यास किये हुए तैयार गले में सारे सुर एक ही जैसी ताक़त लगा के निकल आते है.

ऐसा माना जाता है की हर एक स्वर किसी एक प्राणी की आवाज से संबद्धित है और हर स्वर का एक मायने भी है. हिन्दुस्तानी पद्धति में स्वरों को मानव शरीर के 7 चक्रों से भी जोड़ा जाता है. जानकारी के लिए ये सम्बन्ध नीचे प्रस्तुत हैं लेकिन इस विषय में ज्यादा गहराई में फिलहाल नहीं जायेंगे. 

 स्वर प्राणी चक्र
  मोर / मयूर मूलाधार
 रे बैल स्वाधिष्ठान
 ग बकरी मणिपूर
  कबूतर अनाहत
  कोयल विशुद्ध
  घोड़ा / अश्व आज्ञा
 नी हाथी सहस्रार




आरोह और अवरोह

लगातार बढ़ते हुए सुर में गाने को 'आरोह' कहते है. आरोह मतलब चढ़ना. ठीक इसी तरह से अगर आप नी से शुरू करके उल्टा स पे आते हैं तो उसे 'अवरोह' कहते हैं. अवरोह यानी की उतरना.
आरोह: स --> रे --> ग --> म --> प --> ध --> नी
अवरोह: नी --> ध --> प --> म --> ग --> रे --> स 


सप्तकों के प्रकार
सप्तक में स से लेकर नी तक एक निश्चित क्रम में तीव्रता बढ़ती जाती है. इसी क्रम में अगर स से और नीचे सुर लगायें या फिर नी से और ऊपर सुर लगायें तो? ऐसे करने पर आपका सुर एक सप्तक से दूसरे सप्तक में चला जाता है. तो मुख्यतः तीव्रता के आधार पे सप्तक चार प्रकार के होते हैं: 

  1. खर्ज सप्तक,
  2. मंद्र सप्तक,
  3. मध्य सप्तक और
  4. तार सप्तक.  
खर्ज सप्तक के सुर सबसे नीची तीव्रता या फिर frequency के होते हैं. ये सुनने में बहुत भारी लगते हैं. खर्ज सप्तक के नी के बाद तीव्रता और बढ़ने  पर अगले सप्तक यानी कि मंद्र सप्तक का स लग जायेगा. इसी प्रकार से मंद सप्तक के नी के आगे तीव्रता बढ़ने पर मध्य सप्तक आ जायेगा स से लेकर नी तक. तार सप्तक के सुर सबसे तीव्र होते हैं और सुनने में बहुत चढ़े हुए या पतले लगते हैं. 

समझने के हिसाब से एक बहुत महत्वपूर्ण बात ये है कि हर सप्तक में वही सात सुर हैं, बस उनकी तीव्रता अलग अलग है. तो खर्ज सप्तक का स, मंद्र सप्तक का स, मध्य सप्तक का स और तार सप्तक का स, सारे ही षडज स्वर हैं.  अगर कोई भी दो सप्तक के षडज स्वर आप एक साथ बजाएं, हारमोनियम या फिर सितार पे तो आप को गूंजता हुआ साफ़ अनुनाद या जिसे resonance कहते है वो महसूस होगा. जरा भी आप कोई एक सप्तक का स्वर बदल दें, रे या ग कर दे, वो गूँज नहीं सुनाई देगी और पता चल जायेगा कि अलग अलग सुर बज रहे हैं. 


शुद्ध, कोमल और तीव्र स्वर
अभी जो हमने सात सुरों की बात की वो स्वर शुद्ध कहे जाते हैं. अब इन सात सुरों में से चार सुर ऐसे है जिनके अपनी निर्धारित तीव्रता / pitch से थोड़ी कम तीव्रता वाले स्वरुप भी है (जिसे कोमल स्वर कहते हैं) और सिर्फ एक सुर ऐसा है जिसका अपनी निर्धारित तीव्रता से थोड़ी अधिक तीव्रता वाला स्वरुप है (जिसे तीव्र स्वर कहते हैं). बाकी बचे दो सुरों का सिर्फ शुद्ध स्वरुप हैं, कोई कोमल या तीव्र स्वरुप नहीं है.

शुद्ध, कोमल और तीव्र स्वरों की याद रखने के लिए संक्षेप में जानकारी नीचे प्रस्तुत है. 

शुद्ध स्वर कोमल स्वरुप तीव्र स्वरुप
 स x x
 रे  x
 ग  x
 मx
 प x x
 ध  x
 नी  x

तो इस तरह से जैसा की नीचे दिखाया गया है, सारे शुद्ध, कोमल और तीव्र स्वरुप मिलाकर एक सप्तक की सीमा में बारह (12) स्वर गाये जा सकते है.   

 रे कोमल रे शुद्ध ग कोमल ग शुद्ध म शुद्ध तीव्र  ध कोमल ध शुद्ध नी कोमल नी शुद्ध

    
स्वर निरूपण संकेत (music notation legends) 
जैसे की हमने देखा कि स्वर कई प्रकार के होते हैं इसलिए यहाँ पर निम्न संकेत इस्तेमाल किये जायेंगे. सप्तक का चिह्न स्वर के अक्षर के पहले दिखाया जायेगा. शुद्ध, कोमल और तीव्र का चिह्न, स्वर के बाद दिखाया जायेगा.

 (बिना कोई निशान के): शुद्ध स्वर, मध्य सप्तक का
 ' (' का निशान स्वर के बाद): शुद्ध स्वर, तार सप्तक का' (' का निशान स्वर के पहले): शुद्ध स्वर, मंद्र सप्तक का'' (दो ' का निशान स्वर के पहले): शुद्ध स्वर, खर्ज सप्तक का
+
 (+ का निशान स्वर के बाद): तीव्र स्वर, मध्य सप्तक का
 '+ (' का और + का निशान स्वर के बाद): तीव्र स्वर, तार सप्तक का. इसी प्रकार बाकी सप्तकों के लिए निशान इस्तेमाल होंगे.
रे-
 (- का निशान स्वर के बाद): कोमल स्वर, मध्य सप्तक का
रे
 '- (' का और - का निशान स्वर के बाद): कोमल स्वर, तार सप्तक का. इसी प्रकार बाकी सप्तकों के लिए निशान इस्तेमाल होंगे. 

चल और अचल स्वर 
अचल स्वर वो स्वर होते हैं जिनका सिर्फ एक निर्धारित स्वरुप होता है जिससे ऊपर या नीचे कोई स्वर विकृति नहीं की जा सकती. जैसी हमने पाठ १ में देखा, स (षडज) और प (पंचम) दो अचल स्वर हैं जिनका तीव्र अथवा माध्यम स्वरुप नहीं होता.

चल स्वर वो होतें है जिनके शुद्ध स्वरुप को थोड़ा विकृत कर के एक भिन्न स्वरुप बनाया जा सकता है. सरगम के बाकी पांच स्वर (रे, ग, म, ध, नी) चल स्वर होतें है जिनके विकृत स्वर स्वरुप (तीव्र एवं मध्यम) प्रयोग किये जाते हैं.

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Saturday, October 28, 2017

रियाज का अर्थ है बंदगी

रियाज शब्द रियात से बना है। रियाज का मतलब है इबादत , बंदगी , भक्ति। इन सभी शब्दों का मतलब भक्ति ही है। रियाज जब भक्ति के भाव से किया जाता है तो वह इबादत है। लेकिन आज , रियाज का अर्थ सिर्फ गले का व्यायाम बन कर रह गया है। फर्क तो इतना ही है कि आप उसे भक्ति के भाव से कर रहे हैं या नहीं। रियाज का मतलब है , आप वो सिद्ध करें जो आप अभी तक सिद्ध नहीं कर सके हैं। उसके लिए आप को विश्वास के साथ जूझना पड़ेगा। शुरू-शुरू में आप स्वयं इस बात के प्रति आश्वस्त नहीं होते कि आप जो कर रहे हैं , वह सही है। और आपको सबसे पहले इसी संदेह से जूझना होता है। विश्वास के बिना रियाज में संशय बना रहेगा। इसलिए विश्वास , रियाज के लिए बहुत ही जरूरी है। और इसी के लिए जूझना पड़ेगा। बिना विश्वास के , और संशय के साथ , यदि रियाज करेंगे तो कुछ भी हासिल नहीं हो पाएगा। जैसे संगीत में रियाज का पहला कदम होता है तानपुरे को सुनना , उसकी आवाज पर ध्यान बनाना , फिर खरज या षडज साधना , लंबी सांस लेते हुए ' सा ' को साधते रहना। फिर आहिस्ता-आहिस्ता आपके गुरु के बताए हुए पलटे , पहले सरगम में , फिर आकार , ईकार , ऊकार में। उसके बाद गमक में। यह सब करते हुए मन में लय बनी रहे , और यदि हो सके तो तबले के साथ ताल का भी रियाज हो। इस तरह रियाज रोजमर्रे की चीज है , चाहे वह किसी भी चीज का हो। जैसे संगीत का उदाहरण लें। जब आप का गाना राग और गायकी की स्टेज तक पहुंच जाए तो आपको स्वयं इस बात का अहसास होने लगता है कि आपके गाने में कौन सी बात कमजोर पड़ रही है और कहां आपको ज्यादा ध्यान देना है। कभी राग के बारे में आपको कुछ समझ नहीं आया , कभी बंदिश यानी ख्याल के बोल , या फिर कभी लय के बहर आसानी से पकड़ में नहीं आ रहे हैं... कभी-कभी यह भी होता है कि आज आप एक चीज साध रहे हैं , तो दूसरी छूट गई। लेकिन एक वक्त आएगा जब आपको स्वयं रास्ता मिलेगा कि इस वक्त इस चीज का रियाज करने की जरूरत है। गुरु तो आपका मार्गदर्शन कर ही रहे हैं। एक बात बहुत जरूरी है यहां- अगर आपको अपने गाने में वह सुधार सुनाई दे रहा है , तो आपका रियाज बिल्कुल ठीक चल रहा है। और यदि नहीं , तो डॉक्टर (गुरु) के पास जाइए। मैंने अक्सर देखा है कि रियाज में , और गुरु से शिक्षा लेते समय भी , शागिर्द ' प्रदर्शन ' करने लगता है। इस बेचैनी में वह अपने गुरु को भी नहीं सुनता। गाते समय गुरु के गाने के एक फिकरे के खत्म होने से पहले अपना शुरू कर देता है। और गुरु को भी बारी नहीं देता। यह अति महत्वाकांक्षी होने के कारण होता है। ये दोष अनेक साधकों या शागिर्दों में होता है। रियाज के शुरू के दिनों में एक और दिक्कत पेश आती है। आपको अपना ही गाना कुछ समय के बाद नीरस सा मालूम होने लगता है। इसका मतलब है कि आपको मूड का भी रियाज करना चाहिए। यानी रियाज के लिए मशीनी ढंग से नहीं बैठिए। अच्छा-अच्छा गाना सुनकर अपने आपको री-चार्ज करते रहिए। चिंतन का रियाज बहुत जरूरी है। क्योंकि संगीत की सही समझ , सोच और चिंतन से बनती है। और इसी चिंतन से आप को अपने भीतर छुपे संगीत के दर्शन होते हैं। एक बार साधना में डूब जाने से आपके सुरों में अपने आप असर पैदा होने लगेगा। रियाज का दैनिक क्रम कभी नहीं टूटना चाहिए , चाहे वह दमदार हो या नहीं। उम्र की वजह से यदि आप अपना अभ्यास छोड़ देंगे तो स्नायु नीरस , सख्त और बेजान बन जाएंगे। जब चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाएं तब भी आप भक्ति और भाव से गाएंगे। इतना धुआंधार गाना न सही , लेकिन संगीत का कोई भी फिकरा पूरे चिंतन से अलग नहीं होगा। छोटा या बड़ा फिकरा- सभी कुछ आपके पूरे संगीत की क्षमता से शोभित होगा , क्योंकि तब संगीत सिर्फ फिकरों में नहीं होगा , आप का संगीत , फिकरों के पीछे की गहराइयों तक पहुंच चुका होगा। वही संगीत की आत्मा की असली तस्वीर होगी।

Friday, October 27, 2017

संगीत

Indian Classical MUSIC
भारतीय संगीत आधारित है स्वरों और ताल के अनुशासित प्रयोग पर। सात स्वरों के समुह को सप्तक कहा जाता है। भारतीय संगीत सप्तक के सात स्वर हैं-

सा(षडज), रे(ऋषभ), ग(गंधार), म(मध्यम), प(पंचम), ध(धैवत), नि(निषाद) 


अर्थात

सा, रे, ग, म, प ध, नि

सा और प को अचल स्वर माना जाता है। जबकि अन्य स्वरों के और भी रूप हो सकते हैं। जैसे 'रे' को 'कोमल रे' के रूप में गाया जा सकता है जो कि शुद्ध रे से अलग है। इसी तरह 'ग', 'ध' और 'नि' के भी कोमल रूप होते हैं। इसी तरह 'शुद्ध म' को 'तीव्र म' के रूप में अलग तरीके से गाया जाता है। 


गायक या वादक गाते या बजाते समय मूलत: जिस स्वर सप्तक का प्रयोग करता है उसे मध्य सप्तक कहते हैं। ठीक वही स्वर सप्तक, जब नीचे से गाया जाये तो उसे मंद्र, और ऊपर से गाया जाये तो तार सप्तक कह्ते हैं। मन्द्र स्वरों के नीचे एक बिन्दी लगा कर उन्हें मन्द्र बताया जाता है। और तार सप्तक के स्वरों को, ऊपर एक बिंदी लगा कर उन्हें तार सप्तक के रूप में दिखाया जाता है। इसी तरह अति मंद्र और अतितार सप्तक में भी स्वरों को गाया-बजाया जा सकता है।
अर्थात- ध़ ऩि सा रे ग म प ध नि सां रें गं...

संगीत के नये विद्यार्थी को सबसे पहले शुद्ध स्वर सप्तक के सातों स्वरों के विभिन्न प्रयोग के द्वारा आवाज़ साधने को कहा जाता है। इन को स्वर अलंकारकहते हैं।

आइये कुछ अलंकार देखें

१) सा रे ग म प ध नि सां (आरोह)

सां नि ध प म ग रे सा (अवरोह)

(यहाँ आखिरी का सा तार सप्तक का है अत: इस सा के ऊपर बिंदी लगाई गयी है)

इस तरह जब स्वरों को नीचे से ऊपर सप्तक में गाया जाता है उसे आरोह कहते हैं। और ऊपर से नीचे गाते वक्त स्वरों को अवरोह में गाया जाना कहते हैं। 

और कुछ अलंकार देखिये-

२)सासा रेरे गग मम पप धध निनि सांसां । 
सांसां निनि धध पप मम गग रेरे सासा।
३) सारेग, रेगम, गमप, मपध, पधनि, धनिसां। 
सांनिध, निधप, धपम, पमग, मगरे, गरेसा।

४) सारे, रेग, गम, मप, पध, धनि, निसां। 
सांनि, निध, धप, पम, मग, गरे, रेसा।

५) सारेगमप, रेगमपध, गमपधनि, मपधनिसां। 
सांनिधपम, निधपमग, धपमगरे पमगरेसा।

६)सारेसारेग, रेगरेगम, गमगमप, मपमपध, पधपधनि, धनिधनिसां। 
सांनिसांनिध, निधनिधप, धपधपम, पमपमग, मगमगरे, गरेगरेसा।

७)सारेगसारेगसारेसागरेसा, रेगमरेगमरेगरेमगरे, गमपगमपगमगपमग, मपधमपधमपमधपम, पधनिपधनिपधपनिधप, धनिसांधनिसांधनिधसांनिध, निसांरेनिसांरेनिसांनिरेंसांनि, सांरेंगंसांरेंगंसांरेंसांगंरेंसां। 

सांरेंगंसांरेंगंसांरेंसांगंरेंसां, निसांरेनिसांरेनिसांनिरेंसांनि,धनिसांधनिसांधनिधसांनिध, पधनिपधनिपधपनिधप, मपधमपधमपमधपम, गमपगमपगमगपमग, रेगमरेगमरेगरेमगरे, सारेगसारेगसारेसागरेसा।

Thursday, October 26, 2017

हिन्‍दुस्‍तानी शास्‍त्रीय संगीत


मनुष्‍य ने युगों से अपनी आत्‍मा की क्रियाशीलता को अभिव्‍यक्‍त करने का प्रयास किया है, जो कि कला के माध्‍यम से सांसारिकता के आगे की तलाश है । 
काव्‍य, चित्रकला और अन्‍य दृश्‍य कलाओं का विकास पत्‍थर, पत्‍तों तथा कागज पर हुआ है । संगीत का संबंध श्रवण से है, ऐसा कोई प्रमाण उपलब्‍ध नहीं है । अत: प्राचीन समय के संगीत को आज सुन पाना संभव नहीं है ।
ऐसे सांस्‍कृतिक अन्‍तर्संबंधों की विविधता के बावजूद, हमारा संगीत तत्‍त्‍वत: रागात्‍मक रहा है । इसमें एक स्‍वर दूसरे स्‍वर के बाद आता है और प्रभाव की एक सतत इकाई का सृजन होता है, जबकि स्‍वर संगति में संगीतात्‍मक स्‍वर एक-दूसरे पर अध्‍यारोपित किए जाते हैं । हमारे शास्‍त्रीय संगीत ने स्‍वरमाधुर्य के गुण को बनाए रखा है ।
आज हम शास्‍त्रीय संगीत की दो पद्धतियों को पहचानते हैं: हिन्‍दुस्‍तानी एवं कर्नाटक । कर्नाटक संगीत कर्नाटक, आन्‍ध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल तक सीमित है। शेष देश के शास्‍त्रीय संगीत का नाम हिन्‍दुस्‍तानी शास्‍त्रीय संगीत है । नि:संदेह, कर्नाटक और आन्‍ध्र में कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां हिन्‍दुस्‍तानी शास्‍त्रीय पद्धति का भी अभ्‍यास किया जाता है । कर्नाटक ने अभी हाल ही में हमें हिन्‍दुस्‍तानी शैली के कुछ अति विशिष्‍ट संगीतकार दिए हैं ।
सामान्‍य रूप से यह विश्‍वास किया जाता है कि तेरहवीं शताब्‍दी से पूर्व भारत का संगीत कुल मिलाकर एकसमान है, बाद में जो दो पद्धतियों में विभाजित हो गया था ।
वर्तमान भारतीय संगीत का प्राचीन समय से विकास हुआ है। लगभग प्रत्‍येक जनजाति या व्‍यक्ति ने इस विकास में अपने हिस्‍से का योगदान दिया है । अत: जिसे अब हम राग कहते है वह जनजातीय या लोक धुन के रूप में प्रारम्‍भ हुआ होगा ।

   
 
वेदों के गुणगान करने की रागात्‍मक प्रवृत्तियों से भारतीय संगीत को प्रारम्‍भ करना सामान्‍य सी बात है । प्राचीनतम संगीत जिसमें व्‍याकरण निहित था, वैदिक था । नि:संदेह, ऋग्‍वेद को प्राचीनतम कहा जाता है : लगभग 5000 वर्ष पुराना । ऋग्‍वेद के गान को ऋचाएं कहते हैं । यजुर्वेद भी एक धार्मिक गुणगान है लेकिन उन बीते हुए दिनों का उत्‍तरी और दक्षिणी भारत में वास्‍तविक संगीत इस प्रकार का नहीं हो सकता था । अनार्य होते थे, जिनकी अपनी कला थी, उदाहरण के लिएं, भारत के पूर्वी क्षेत्र का संथाल संगीत उनके सामने से ही होकर गुजर गया होगा । जबकि मतभेद स्‍पष्‍ट हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है कि लोगों के इस संगीत ने, जिसे अब हम हिन्‍दुस्‍तानी शास्‍त्रीय संगीत कहते हैं, की रचना में अपना योगदान दिया होगा ।
 
भारतीय संगीत के इतिहास में भरत का नाट्यशास्‍त्र एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण सीमाचिह्न है । यह माना जाता है कि इसे दूसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व और दूसरी शताब्‍दी ईसवी सन् के बीच किसी समय लिखा गया होगा । कुछ विद्वानों को तो यह संदेह है कि क्‍या यह मात्र एक लेखक की रचना (ग्रंथ) है तथा यह एक सार-संग्रह रहा होगा जिसका रूपान्‍तर हमें उपलब्‍ध है । नाट्यशास्‍त्र एक व्‍यापक रचना या ग्रंथ है जो प्रमुख रूप से नाट्यकला के बारे में है लेकिन इसके कुछ अध्‍याय संगीत के बारे में हैं । इसमें हमें सरगम, रागात्‍मकता, रूपों और वाद्यों के बारे में जानकारी मिलती है । तत्‍कालीन समकालिक संगीत ने दो मानक सरगमों की पहचान की । इन्‍हें ग्राम कहते थे । शब्‍द ग्राम ही संभवत: किसी समूह या सम्‍प्रदाय उदाहरणार्थ एक गांव के विचार से लिया गया है । यही संभवत: स्‍वरों की ओर ले जाता है जिन्‍हें ग्राम कहा जा रहा है । इसका स्‍थूल रूप से सरगमों के रूप में अनुवाद किया जा सकता है । उस समय दो ग्राम प्रचलन में थे । इनमें से एक को षडज ग्राम और अन्‍य को मध्‍यम ग्राम कहते थे । दो के बीच का अन्‍तर मात्र एक स्‍वर पंचम में था । अधिक सटीक रूप से कहें तो हम यह कह सकते हैं कि मध्‍यम ग्राम में पंचम षडज ग्राम के पंचम से  एक श्रुति नीचे था ।
 

इस प्रकार से श्रुति मापने की एक इकाई है या एक ग्राम अथवा एक सरगम के भीतर विभिन्‍न क्रमिक तारत्‍वों के बीच एक छोटा-सा अन्‍तर है । सभी व्‍यावहारिक प्रयोजनों के लिए, इनकी संख्‍या बाइस बताई जाती है । जहां तक व्‍यावहारिक गणना का संबंध है, यह मात्र इसी के लिए है । जैसा कि हम कहेंगे कि एक सप्‍तक में सात स्‍वर हैं- सा से ऊपरी सा या तारसप्‍तक के सा तक, लेकिन वास्‍तव में भारतीय संगीत में प्रयोग में लायी जाने वाली, श्रुतियों की संख्‍या असीम है ।
भरत के समय में ग्राम पर लौटें तो इनकी संख्‍या दो है, तथा प्रत्‍येक में सात स्‍वर हैं । भरत ने दो अन्‍य स्‍वरों का उल्‍लेख भी किया है: अन्‍तरा गांधार और काकली निषाद ।
अब प्रत्‍येक ग्राम से अनुपूरक सरगम लिए गए हैं । इन्‍हें मूर्छना कहते हैं । ये एक अवरोही क्रम में बजाए या गाए जाते हैं । एक सरगम में सात मूलभूत स्‍वर होते हैं, अत: सात मूर्छना हो सकते हैं, जैसा कि उल्‍लेख किया गया था, ग्राम दो होते हैं और प्रत्‍येक के सात मानक स्‍वर और दो पूरक स्‍वर होते हैं । चूंकि प्रत्‍येक स्‍वर एक मूर्छना दे सकता है, ऐसे असंख्‍य पूरक सरगम प्राप्‍त किए जा सकते हैं । यह दिखा पाना संभव है कि ग्राम से चौंसठ मूर्छना प्राप्‍त किए जा सकते हैं । इस प्रक्रिया ने स्‍वर संबंधी अलग-अलग पद्धतियां दी जिनके भीतर रहते हुए उन दिनों के सभी ज्ञात लय को समूहबद्ध किया जा सकता है या फिर इनका विकास किया जा सकता है । यह स्थिति कई शताब्दियों तक बनी रही । लगभग तेरहवीं शताब्‍दी ईसवी सन् में शारंगदेव जिनके पूर्वज कश्‍मीर से थे- दक्षिण भारत में बस गए और अपने अतयन्‍त महत्‍त्‍वपूर्ण संगीत रत्‍नाकर की रचना की । इन्‍होंने मूर्छना और ग्राम जैसे तकनीकी शब्‍दों का वर्णन भी किया । मानक सरगमें अब भी वही थीं । जबकि भरत दो सहायक स्‍वरों का उल्‍लेख करते हैं, मध्‍यकालीन युग में इनकी संख्‍या तथा परिभाषा बहुत भिन्‍न थी ।

 
प्राय: रूपात्‍मक संगीत कहलाने वाली समूची योजना अब हमें काफी अपरिचित प्रतीत होती है लेकिन इस तथ्‍य पर कदापि संदेह नहीं किया जा सकता कि यह अत्‍यधिक उन्‍नत और वैज्ञानिक थी । 

लगभग ग्‍यारहवीं शताब्‍दी से, मध्‍य और पश्चिम एशिया के संगीत ने हमारी संगीत की परम्‍परा को प्रभावित करना प्रारम्‍भ कर दिया था । धीरे-धीरे इस प्रभाव की जड़ गहरी होती चली गई और कई परिवर्तन हुए । इनमें से एक महत्‍त्‍वपूर्ण परिवर्तन था- ग्राम और मूर्छना का लुप्‍त होना ।
लगभग पन्‍द्रहवीं शताब्‍दी के आसपास, परिवर्तन की यह प्रक्रिया सुस्‍पष्‍ट हो गयी थी, ग्राम पद्धति अप्रचलित हो गई थी । मेल या थाट की संकल्‍पना ने इसका स्‍थान से लिया था । इसमें मात्र एक मानक सरगम है । सभी ज्ञात स्‍वर एक सामान्‍य स्‍वर ‘सा’ तक जाते हैं ।
लगभग अठारहवीं शताब्‍दी तक, यहां तक कि हिन्‍दुस्‍तानी संगीत के मानक या शुद्ध स्‍वर भिन्‍न हो गए थे । अठारहवीं शताब्‍दी से स्‍वीकृत, वर्तमान स्‍वर है :
सा रे ग म प ध नि

यह आधुनिक राग बिलावल का मेल आरोह है । इन सात शुद्ध स्‍वरों या स्‍वरों के अतिरिक्‍त, पांच रूप भेद हैं जिसमें कुल सभी बारह स्‍वर मिल कर सप्‍तक बनाते हैं ।
सा रे रे ग ग म म प ध ध नि नि
नि:संदेह, बेहतर रूपभेद है: ये श्रुतियां हैं । अत: इन्‍हें स्‍वर के बजाए 12 स्‍वर संबंधी क्षेत्र कहना बेहतर होगा ।

सभी ज्ञात राग इस बारह स्‍वरों की सरगम में समूहबद्ध हैं । सत्‍तरहवीं शताब्‍दी के एक कर्नाटक संगीत विज्ञानी वेंकटमुखी ने इन बारह स्‍वरों से तैयार किए गए 72 मेलों की एक पद्धति बनाई । बाद में, बीसवीं शताब्‍दी में पंडित भातखण्‍डे ने हिन्‍दुस्‍तानी रागों का वर्गीकरण करने के लिए 72 में से 10 को चुना ।
 
अभी तक हमने (स्‍वरग्राम) सरगमों की चर्चा की है: ग्राम, मूर्छना और मेल । यह स्‍पष्‍ट ही है कि इन संकल्‍पनाओं का विकास रागों के जन्‍म के पश्‍चात हुआ था । कोई भी लोक गायक एक ग्राम या एक मेल के बारे में नहीं सोचता । जनजातीय और लोक गीत पहले के और बिना किसी सचेत व्‍याकरण के आज भी विद्यमान हैं । संगीत विज्ञानी ने बाद में रागों का सरगम या स्‍वरग्राम में वर्गीकरण किया था ।
अब हम अपना ध्‍यान रागात्‍मक संरचनाओं पर देंगे । प्रथम संहिताबद्ध राग के लिए हमें पुन: वेदों का सहारा लेना  होगा । भरत के नाट्य शास्‍त्र में जाति नामक रागात्‍मक रूपों का वर्णन मिलता है । हमें यह जानकारी नहीं है कि इन्‍हें किस प्रकार से गाया या बजाया जाता था । लेकिन नाट्यशास्‍त्र और उत्‍तरवर्ती टीकाओं से कुछ मुख्‍य बिन्‍दु लिए जा सकते हैं । इन जातियों में से प्रत्‍येक को किसी में मूर्छना या अन्‍य में डाला जा सकता है । ग्रह (प्रारम्भिक स्‍वर) न्‍यास (वह स्‍वर जिस पर एक वाक्‍यांश रुकता है), स्‍वरों के राग-निम्‍न तारत्‍व से उच्‍च तारत्‍व जैसी विशेषताएं इन्‍हें  विशिष्‍ट बनाती हैं । कई विद्वानों की राय यह है कि राग की संकल्‍पना, जो हमारे संगीत के लिए मूलभूत है, का जन्‍म और विकास जाति से हुआ था । राग के बारे में मतंग का वृहद्देशी नामक एक प्रमुख ग्रंथ है । यह ग्रंथ लगभग छठी शताब्‍दी ईसवीं सन् का है । इस समय तक एक रागात्‍मक योजना के रूप में राग का विचार सुस्‍पष्‍ट और सुपरिभाषित हो गया था । मतंग भारत के दक्षिणी क्षेत्र, सटीक रूप से कर्नाटक से थे । इससे यह पता चलता है कि इस युग तक भारतीय संगीत का व्‍याकरण समूचे देश में लगभग एक ही था । दूसरे, उन्‍होंने देशी संगीत के बारे में लिखा है । इसीलिए उन्‍होंने अपने ग्रंथ का नाम वृहद्देशी रखा था
संगीतात्‍मक लय में भारत का एक विशेष योगदान ताल था । ताल समय इकाइयों का एक चक्रीय प्रबंध है । समय विभाजन की मूलभूत इकाइयां लघु, गुरु, और प्‍लुत हैं । वास्‍तव में इन्‍हें काव्‍यात्‍मक छन्‍द शास्‍त्र से लिया गया है । लघु में अक्षर, गुरु दो, और प्‍लुत तीन शामिल हैं । अपेक्षाकृत बड़ी इकाइयां भी हैं । भरत का नाट्यशास्‍त्र विभिन्‍न समय इकाइयों में से ताल का निर्माण करने, इन्‍हें बजाने के तरीके इत्‍यादि के ब्‍यौरे भी देता है । बाद में लेखकों ने 108 तालों की एक योजना का भी विकास किया । ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन तालों के अतिरिक्‍त कुछ नए तालों जैसे फिरदोस्‍त ने हिन्‍दुस्‍तानी संगीत में प्रवेश कर लिया है । हिन्‍दुस्‍तानी पद्धति में ताल बजाने का सबसे महमहत्‍त्‍वपूर्ण पहलू ठेका के भावों का विकास करना रहा है । ठेका एक तबले पर हल्‍के से स्‍पर्श द्वारा एक ताल को स्‍पष्‍ट करता है । ढोल पर प्रत्‍येक हल्‍के स्‍पर्श को एक नाम, एक बोल कहते हैं । उदाहरण के लिए, धा,ता,घे, आदि ।
किसी भी भाषा में हमें एक महाकाव्‍य, एक चतुर्दश-पदी, एक गीतिकाव्‍य, एक लघुकथा, इत्‍यादि मिल सकते हैं । इसी प्रकार से, किसी एक राग और एक ताल का आधार लेकर संगीत के विभिन्‍न रूपों का सृजन किया गया है । प्राचीन समय से लेकर, संगीत के रूपों को दो व्‍यापक श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है । ये अनिबद्ध और निबद्ध थे । प्रथम को खुला या मुक्‍त रूप और द्वितीय को बन्‍द या सीमित कह सकते हैं ।
अनिबद्ध संगीत वह होता है जिसे अर्थपूर्ण शब्‍दों और ताल द्वारा प्रतिबद्ध नहीं किया जा सकता । यह एक मुक्‍त तात्‍कालिक संगीत है । इसका सर्वश्रेष्‍ठ रूप आलाप है ।
निबद्ध संगीत के अनेक रूप हैं । प्रबंध गीति उपलब्‍ध प्रारम्भिक वह रूप है जिसके बारे में कुछ जानकारी मिलती है । वास्‍तव में प्रबंध का प्रयोग प्राय: किसी निबद्ध गीत, संगीतात्‍मक कृति के लिए एक सामान्‍य शब्‍द के रूप में किया जाता है । इन बद्ध रूपों के बारे में हमारे पास बहुत कम प्रमाण हैं, सिवाए इसके कि इन्‍हें रागों और तालों को परिभाषित करने के लिए निर्धारित किया गया था । सभी ज्ञात प्रबंधों में से जयदेव के प्रबंध सर्वश्रेष्‍ठ हैं । यह कवि बारहवीं शताब्‍दी में बंगाल में रहता था और इन्‍होंने गीत गोविन्‍द की रचना की, जो गीतों और श्‍लोकों के साथ संस्‍कृत की एक कृति है । यह अष्‍टपदी है, अर्थात् प्रत्‍येक गीत में आठ पद होते हैं । आज ये गीत समूचे देश में फैल गए हैं और प्रत्‍येक क्षेत्र में इनकी अपनी शैली है । वास्‍तव में, गायकों ने प्रबंधों को अपनी धुनें देने की स्‍वतंत्रता ली        है । इसे दृष्टि में रखते हुए, अष्‍टपदियों की मूल धुनों का निर्धारण कर पाना संभव नहीं है ।
 
जयदेव के गीत गोविन्‍द की लोकप्रियता के कई कारण हैं । नि:संदेह, पहला कारण इस कृति का मूलभूत काव्‍यात्‍मक सौन्‍दर्य है जो लगभग अद्वितीय है । पुन: यह संस्‍कृत में और अन्‍य भाषाओं में भी तैयार हुआ है । इन सब के अतिरिक्‍त, भक्ति ही सबसे महान तथा महत्‍त्‍वपूर्ण है जिसने इसे जीवित रखा है । भक्ति या आराधना उतनी पुरानी है जितना कि मनुष्‍य । यह वास्‍तव में मन की वह स्थिति है जिसमें ईश्‍वर से विनती की जाती  है ।
 
जबकि ईश्‍वरत्‍व भक्‍त के पास शिव के रूप में या एक परब्रह्म के रूप में कई रूप ले कर जाता है- श्री विष्‍णु के दस अवतार की कथा के रूप में भागवत ने भारतीय मानस को जीत लिया है, इसी समय गीतों तथा भवनों की रचना की गई थी, इन दोनों के उपदेश और भजन तरंगों के रूप में उत्‍तर भारत तक पहुंचे ताकि हमें जयदेव, चैतन्‍य महाप्रभु, शंकरदेव, कबीर, तुलसी, मीरां, तुकाराम, एकनाथ, नरसी और नानक जैसे सन्‍त कवि मिल सकें । इस भक्ति आन्‍दोलन ने सूफी सहित सभी धर्मों और वर्गों का परिग्रहण कर लिया । इसने हमें अभंग, कीर्तन, भजन, बाउल गीतों जैसे असंख्‍य भक्तिपूर्ण गीत दिए ।
ध्रुपद द्वारा निबद्ध संगीत के महान औपचारिक पहलू से परिचय होता है । विश्‍वास किया जाता है कि यह प्रबंध संरचना का विस्‍तार है । चौदहवीं शताब्‍दी से लेकर अठारहवीं शताब्‍दी तक ध्रुपद ने लोकप्रियता के लिए एक प्रेरक शक्ति अर्जित की और पन्‍द्रहवीं शताब्‍दी से लेकर अठारहवीं शताब्‍दी तक की अवधि में इसका विकास हुआ । इन शताब्दियों के दौरान हम इसी शैली के सर्वाधिक सम्‍मानित तथा सुप्रसिद्ध गायकों एवं संरक्षकों से परिचित होते हैं । मानसिंह तोमर, ग्‍वालियर के महाराजा ही ध्रुपद की व्‍यापक लोकप्रियता के लिए प्रमुख रूप से उत्‍तरदायी थे । बैजू, बक्षु और अन्‍य भी थे । वृंदावन के स्‍वामी हरिदास न केवल एक ध्रुपदिया थे बल्कि भारत के उत्‍तरी क्षेत्रों में भक्ति सम्‍प्रदाय की सर्वाधिक महत्‍त्‍वपूर्ण विभूतियों में से एक थे । परम्‍परानुसार, स्‍वामी हरिदास तानसेन के गुरु थे, जो ध्रुपद के ज्ञात सर्वोत्‍तम गायकों में एक और सम्राट अकबर के राजदरबार के नौ रत्‍नों में से एक थे ।
ध्रुपद संरचना के दो भाग है, अनिबद्ध अनुभाग और संचारी में धृपद । गायकों प्रथम मुक्‍त आलाप है । ध्रुपद विशिष्‍टत: चार भागों में गाया जाने वाला एक गीत है: स्‍थाई, अन्‍तरा, संचारी और अभोग ।
ध्रुपद की अनिवार्य विशेषता इसकी गंभीरता और लय पर बल है । ध्रुपद को गाने की चार शैलियां या वाणियां थीं । गौहर वाणी में राग या अनलंकृत रागात्‍मक आकृतियों का विकास है । डागर वाणी में रागात्‍मक वक्रताओं और शालीनताओं पर बल दिया गया है । कंधार वाणी में स्‍वरों के शीघ्र अलंकरण की विशेषता है । नौहर वाणी अपने व्‍यापक संगीतात्‍मक लंघन (आकस्मिक परिवर्तनों) के लिए जानी जाती थी । ये वाणियां अब अद़ृश्‍य हो गई हैं ।
ध्रुपद का आज भी अत्‍यधिक सम्‍मान किया जाता है और इसे संगीत-समारोह के मंच पर तथा अधिकांशत: उत्‍तर भारत के मन्दिरों में सुना जा सकता है । अब यह जनसाधारण में इतना लो‍कप्रिय भी नहीं रह गया है और पृष्‍ठभूमि में चला गया है । ध्रुपद से घनिष्‍ठ रूप से बीन और पखावज़ को भी आजकल अधिक संरक्षण या लोकप्रियता प्राप्‍त नहीं है ।
 
आज शास्‍त्रीय हिन्‍दुस्‍तानी संगीत में ख्‍याल को गौरव का स्‍थान प्राप्‍त है । हम वास्‍तव में ख्‍याल के आरम्‍भ के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकते । यह एक विदेशी शब्‍द है और इसका अर्थ ‘कल्‍पना’ है और इसे सुनेंगे तो यह पाएंगे कि यह ध्रुपद से अधिक गीतात्‍मक है, लेकिन यह संदेह का विषय है कि क्‍या इसका संगीतात्‍मक रूप भी विदेशी है । कुछ विद्वानों की यह राय है कि वास्‍तव में इसकी जड़ें प्राचीन भारतीय रूपक आलापों में हैं । यह भी कहा जाता है कि तेरहवीं शताब्‍दी के अमीर खुसरो ने भी इसे प्रोत्‍साहन दिया । पन्‍द्रहवीं शताब्‍दी के सुलतान मोहम्‍मद शर्खी को ख्‍याल को प्रोत्‍साहित करने का श्रेय जाता है तथापि इसे अठारहवीं शताब्‍दी के नियामत खान,  सदारंग और अदारंग के हाथों परिपक्‍वता मिली थी ।
 
आज ख्‍याल जिस रूप में गाया जाता है इसकी दो विविधताएं हैं : धीमी लय या विलम्बित ख्‍याल और तेज या द्रुत ख्‍याल । रूप में ये दोनों एक समान हैं । इनके दो अनुभाग होते हैं- स्‍थाई और अन्‍तरा । विलम्बित को धीमी लय में गाया जाता है और द्रुत को तेज लय से तकनीक की दृष्टि से प्रतिपादन ध्रुपद की तुलना में कम महत्‍त्‍वपूर्ण है । अधिक कोमल गमक और अलंकरण होते हैं ।
दोनों प्रकार के ख्‍यालों के दो अनुभाग होते हैं । स्‍थाई और अन्‍तरा स्‍थाई अधिकांशत: निम्‍न और मध्‍यम सप्‍तक तक सीमित रहती है । अन्‍तरा सामान्‍यत: मध्‍यम और ऊपरी सप्‍तकों में चलता है । स्‍थाई और अन्‍तरा मिल कर एक गीत, रचना या बन्दिश बनाते हैं जिसे हम ‘चीज़’ कहते हैं । एक समग्र कृति के रूप में यह राग के उस सार को उद्घाटित करता है जिसमें इसे स्‍थापित किया जाता है ।
ध्रुपद में वाणियों की तुलना में ख्‍याल में घराने होते है । ये विभिन्‍न व्‍यक्तियों या राजाओं अथवा कुलीन पुरुषों जैसे संरक्षकों द्वारा स्‍थापित या विकसित गायन शैलियां हैं ।
इनमें से प्राचीनतम ग्‍वालियर घराना है । इस शैली के प्रवर्तक एक नत्‍थन पीरबख्‍श थे जो ग्‍वालियर में बस गए थे और इसीलिए इसका यह नाम पड़ा । इनके हद्दू खां और हस्‍सू खां नाम के दो पोते थे । ये उन्‍नीसवीं शताब्‍दी में हुए थे और इस शैली के महान उस्‍ताद माने जाते थे । इस घराने की विशेषता खुला स्‍वर, शब्‍दों का स्‍पष्‍ट उच्‍चारण तथा राग, स्‍वर और ताल की ओर एक व्‍यापक ध्‍यान है । इस घराने के कुछ प्रमुख गायक कृष्‍णराव शंकर पण्डित, राजा भैया पूंछवाले आदि हैं ।
आगरा घराने के बारे में कहा जाता है कि इसकी स्‍थापना आगरा के खुदा बख्‍श ने की है । इन्‍होंने ग्‍वालियर के नत्‍थन पीरबख्‍श के साथ अध्‍ययन किया था लेकिन इन्‍होंने अपनी शैली का विकास किया । इस घराने में भी स्‍वर खुला और स्‍पष्‍ट है । इस घराने की विशेषता बोल तान है अर्थात् गीत के बोल या शब्‍दों का प्रयोग करके एक द्रुत या मध्‍यम लयकारी परिच्‍छेदी गीत को मध्‍यम ताल में गाया जाता है । हाल के इस घराने के सबसे प्रसिद्ध संगीतकार विलायत हुसैन खां और फैयाज़ खां रहे हैं ।
 
जयपुर अतरौली घराने के बारे में यह कहा जाता है कि यह सीधे ध्रुपद से निकला है । यह उन्‍नीसवी-बीसवीं शताब्‍दी के अल्‍लादिया खां द्वारा स्‍थापित है । इस घराने का ख्‍याल सदैव मध्‍यम लय में होता है । शब्‍दों का उच्‍चारण स्‍पष्‍ट रूप में और एक खुले तथा स्‍पष्‍ट स्‍वर में किया जाता है । इसकी विशिष्‍ट विशेषताएं वे परिच्‍छेद हैं जो प्राथमिक रूप से अलंकारों पर आधारित हैं, अर्थात् आवृत्तिमूलक रागात्‍मक मूलभाव-और ताल प्रभाग का एक लगभग तानमानी आग्रह । हाल के कुछ प्रमुख गायक मल्लिकार्जुन मंसूर, किशोरी अमोनकर आदि रहे हैं ।

अन्‍त में हम रामपुर सहसवान घराने पर आते हैं। चूंकि प्रारम्भिक गायक उत्‍तर प्रदेश के रामपुर के थे, इसलिए इस घराने का भी यही नाम पड़ गया । इसमें धीमे और द्रुत ख्‍याल सामान्‍यत: एक तराने के बाद गाते हैं । इस घराने की गायन शैली अति गीतात्‍मक है और स्‍वर अलंकरण से परिपूर्ण होते हैं । हाल के इस घराने के दो प्रमुख गायक निसार हुसैन खां और रशीद खां रहे हैं ।
ठुमरी और टप्‍पा संगीत-समारोहों में सुनी जाने वाली लोकप्रिय गायन शैलियां हैं । ठुमरी अपनी संरचना और प्रस्‍तुति में अति गीतात्‍मक है । इन गायन प्रकारों को ‘अर्द्ध’ या ‘सुगम’ शास्‍त्रीय नाम दिया जाता है । ठुमरी एक प्रेम गीत है और इसलिए शब्‍द रचना अति महत्‍त्‍वपूर्ण है । यह संगीतात्‍मक वादन से घनिष्‍ठ रूप से समन्वित है, और ठुमरी को गाए जाने के लिए मनोदशा को ध्‍यान में रखते हुए इसे खमाज, काफी, भैरवी इत्‍यादि जैसे रागों में प्रस्‍तुत  किया जाता है और संगीतात्‍मक व्‍याकरण का सख्‍ती से पालन नहीं किया जाता । ठुमरी गायन की दो शैलियां हैं: पूरब या बनारस शैली जो काफी हद तक धीमी तथा सौम्‍य है और पंजाब शैली, जो अधिक जीवंत है । रसूलन देवी, सिद्धेश्‍वरी देवी इस शैली की प्रमुख गायिकाएं रही हैं ।
टप्‍पा एक ऐसा गीत होता है जिसमें स्‍वरों को द्रुत लय में गाया जाता है । यह एक कठिन रचना होती है और इसमें अधिक अभ्‍यास की आवश्‍यकता होती है । ध्रुपद और ख्‍याल शैलियों की भांति, ठुमरी और टप्‍पा दोनों के लिए विशेष प्रशिक्षण अपेक्षित होता है । टप्‍पा जिन रागों में गाया जाता है, वे उसी प्रकार के राग होते हैं जिनमें ठुमरी गाई जाती है । टप्‍पा गायन में पण्डित एल. के. पण्डित और मालिनी राजुरकर को विशेषज्ञता प्राप्‍त रही है ।

Tuesday, October 24, 2017

हिंदुस्तानी संगीत में ध्वनि का महत्व ज्यादा है, जबकि कर्नाटक संगीत में भावों का।


हमारे जीवन में ध्वनि की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। हम चारों ओर से ध्वनियों से घिरे हुए हैं। योग शास्त्र में कहा जाता है – नाद ब्रह्म; यानी ध्वनि ही इश्वर है। ऐसा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि हमारा शरीर और सारा जगत एक ध्वनी या फिर कंपन ही है। इसका अर्थ है कि अलग-अलग तरह की ध्वनियों हम पर अलग-अलग तरह के असर डाल सकती हैं। ध्वनी की इसी समझ से जन्म हुआ है भारतीय शास्त्रीय संगीत का। आइये आगे जानते हैं सद्‌गुरु से भारतीय संगीत के बारे में… 
मानव शरीर और मन को ध्वनि कैसे प्रभावित करती है, इसे समझने और जानने में मेरी गहरी रुचि रही है। मैंने अपनी हर यात्रा में इस पर अध्ययन किया है। ध्वनि को जितनी गहराई के साथ हिंदुस्तानी संगीत में देखा गया है, उतना दुनिया में कहीं और नहीं देखा गया।
भारतीय शास्त्रीय संगीत की दो मूल शाखाएं हैं। कर्नाटक संगीत, जिसका संबंध दक्षिण से है और हिंदुस्तानी संगीत जो उत्तर भारत का संगीत है। हिंदुस्तानी संगीत में ध्वनि का महत्व ज्यादा है, जबकि कर्नाटक संगीत में भावों का। ऐसा नहीं है कि कर्नाटक संगीत के जानकारों को ध्वनि का कोई ज्ञान नहीं है, बेशक ज्ञान है, लेकिन इसमें भाव प्रधान रहता है। हो सकता है, काफी पहले ऐसा न हो, लेकिन पिछले चार सौ साल के दौरान कर्नाटक संगीत में ध्वनि की जगह भाव मुख्य हो गए हैं। ऐसा भक्ति आंदोलन के कारण हुआ है जो दक्षिण भारत में चलाया गयाथा। आज जो भी कर्नाटक संगीत है, उसमें से ज्यादातर की रचना त्यागराज और पुरंदरा दास जैसे भक्तों ने की थी और इस तरह संगीत में ज्यादा से ज्यादा भाव लाया गया। दूसरी तरफ हिंदुस्तानी संगीत में भावों की जगह ध्वनी को मुख्य स्थान दिया गया। इसमें ध्वनि का इस तरह इस्तेमाल किया गया, जिससे यह मन और शरीर पर एक ख़ास प्रभाव डाल सके। हिंदुस्तानी संगीत के तहत संगीत के कई अनुभाग हैं। हर अनुभाग संगीत की एक ख़ास तरह की रचना पर ध्यान देता है। अगर आप हिंदुस्तानी संगीत की वाकई में खूबी जानना चाहते हैं, तो आपको कम से कम एक से दो साल की ट्रेनिंग की जरूरत होगी। यह ट्रेनिंग आपको इस लायक बना देगी कि आप इस संगीत की बारीकियों की तारीफ कर सकें। सीखने या किसी संगीत समारोह में प्रदर्शन करने के लिए काफी ज्यादा अभ्यास की जरुरत है। इसमें ध्वनि का इस तरीके से प्रयोग किया जाता है, कि अगर आप इसे ग्रहण करने के लिए तैयार हैं तो आपके साथ चमत्कारिक चीजें हो सकती हैं।

शास्त्रीय संगीत और योग


 ‘ध्वनि ही ईश्वर है’ – ऐसा इसलिए क्योंकि इस जीवन का आधार कंपन में है, यह कंपन ही ध्वनि है।



ध्वनि का अर्थ क्या है? योग में हम कहते हैं ‘नाद ब्रह्म’, जिसका मतलब है ‘ध्वनि ही ईश्वर है’। ऐसा इसलिए क्योंकि इस जीवन का आधार कंपन में है, यह कंपन ही ध्वनि है। इसे हर इंसान महसूस कर सकता है। अगर आप अपने भीतर ही भीतर एक खास अवस्था में पहुंच जाएं तो पूरा जगत ध्वनि हो जाता है। यह संगीत इसी तरह के अनुभव और समझ से विकसित हुआ। अगर आप ऐसे लोगों को गौर से देखेंगे जो शास्त्रीय संगीत से गहराई से जुड़े हैं, तो आपको लगेगा कि वे स्वाभाविक रूप से ही ध्यान की अवस्था में रहते हैं। वे संतों जैसे हो जाते हैं। इसलिए इस संगीत को महज मनोरंजन के साधन के तौर पर ही नहीं देखा गया, बल्कि यह आध्यात्मिक प्रक्रिया के लिए एक साधन की तरह था। रागों का प्रयोग इंसान की समझ और अनुभव को ज्यादा उन्नत बनाने के लिए किया गया।

संगीत के क्षेत्र में शुरुआत करने के लिए आपको शास्त्रीय संगीत पर नए प्रकाशनों की मदद लेनी चाहिए। इन संगीतों में थोड़ा फेरबदल किया गया है, और उन्हें एक ख़ास तरह से बनाया गया है। इसके कारण जिस शख्स के पास संगीत की जरा भी ट्रेनिंग नहीं है, वह भी इसका मूल्य समझ सकता है। उदाहरण के लिए म्यूजिक टुडे सीरीज में सुबह, दोपहर, शाम और रात के समय गाए जाने वाले रागों का संकलन है। कई जाने-माने संगीतकारों और बड़े कलाकारों के संगीत के संकलनों को भी आप खरीद सकते हैं। इनमें से कई कलाकार तो हमारे यहां योग केंद्र में भी आ चुके हैं। ईशा योग केंद्र पर साल में दो बार हम संगीत कार्यक्रम का भी आयोजन करते हैं। इसका मकसद लोगों को संगीत की बारीकियों से परिचित करना होता है।


Monday, October 23, 2017

रियाज़ कैसे करें

रियाज़ करने की शुरुआत के लिए आप इस प्रकार से कोशिश करें -
1) संगीत सीखने का सबसे पहला पाठ और रियाज़ ओंकार का है. वेबसाइट पर इसके बारे में बताया गया है. ३ महीनो तक आप रोज़ सुबह कम से कम ३० मिनट 'सा' के स्वर में ओंकार का लगातार अभ्यास करें.
2) अगर आप और समय दे सकते हैं तो ओंकार रियाज़ करने के बाद 5 मिनट आराम कर के, सरगम आरोह अवरोह का धीमी गति में ३० मिनट तक रियाज़ करें. जल्दबाजी नहीं करें.
3) सरगम का रियाज़ करते समय स्वर ठीक से लगाने का पूरा ध्यान रखें. अगर स्वर ठीक से नहीं लग रहा है तो बार बार कोशिश करें. संगीत अभ्यास में लगन की जरूरत होती है और शुरुआत में बहुत धीरज और इत्मीनान चाहिए.
4) रियाज़ में खर्ज़ का रियाज़ सबसे अच्छा माना जाता है. खर्ज़ के रियाज़ के बारे में सुर साधना की वेबसाइट में पढ़ें. खर्ज़ का रियाज़ करने से गायकी में गहराई और ऊंचे स्वर लगाने की काबलियत आती है. खर्ज़ के सुर लगाना थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन अगर खर्ज़ का रियाज़ सुबह ५ से ६ बजे के बीच में किया जाये तो आसानी से हो जाता है. एक अच्छे गायक के लिए सारे सप्तकों (इसके बारे में वेबसाइट में पढ़िए) में गा पाना महत्वपूर्ण है और ऐसा कर पाने के लिए खर्ज़ का रियाज़ ही एक मात्र अभ्यास है. इसे मन लगा कर, रोज एक अनुशासन के साथ, साधना की तरह करना चाहिए.
5) संगीत को भगवान की दें मानी जाती है और ऐसा सोंचा जाता है की जिसपे भगवान की कृपा होती है वही गा सकता है. परन्तु ईश्वर ने सबको अपनी कर्मठता से अपने सपने साकार करने की शक्ति दी है. अगर आपका गला और आवाज़ साधारण भी है, तो भी जबरदस्त रियाज़ करके आप अपनी आवाज़ में न सिर्फ नयी जान ला सकते है बल्कि संगीत की बुलंदियों को छू सकते हैं.
6) कई बार संगीत सीखते समय लोग पूंछते हैं कि कितना रियाज़ करना पड़ेगा और कब तक. एक सच्चे संगीत सीखने वाले के लिए रियाज़ कभी ख़त्म नहीं होता और कितना भी रियाज़ ज्यादा नहीं होता और ये बात मैं सिर्फ एक कहने कि बात के लिए नहीं लिख रहा, ये एक सदी दर सदी चली आ रही है सच्चाई है. लेकिन एक बात और मै कह सकता हूँ कि जब तक आपको गाने में मेहनत पड़ रही है, जब तक बहुत कोशिश करनी पड़ रही है तब तक आपको सिर्फ और सिर्फ रियाज़ करना चाहिए, गाने और रागों के पीछे नहीं भागना चाहिए. जब आपकी सरगम आरोह अवरोह में सहजता आ जाये और स्वर के बारे में सोंचने भर से आप एक बार में सही स्वर लगता सकते है, बिना किसी सहायता के, तब आप समझिये कि अब आप संगीत के अगले चरण, रागों कि दुनिया में कदम रख सकते हैं.
7) रियाज़ करते समय आपकी चार प्रकार से तैयारी होती है. एक - आपकी साँस की शक्ति और नियंत्रण स्थिर होते हैं, दो - आपके गले की पेशियाँ गायकी के उतार चढ़ाव के तनाव को सहजता से झेलने के लिए तैयार होती हैं, तीन - आपके कान और दिमाग स्वर को स्वतः प्राकृतिक रूप से पकड़ पाने में समर्थ होते है और चार - आपका मन और आंतरिक सोंच गायकी के लिए जरूरी धैर्य, एकाग्रचित्तता, पवित्रता और सकारात्मकता लाती है. अच्छा गायक बनाने के लिए इन चारों ही प्रकार से अपने आप को विकसित करना जरूरी है.
8) अगर आप रोजाना और पर, समय लगा कर कड़ा रियाज़ कर रहे हैं तो 10 -15 दिन के लगातार रियाज़ करने के बाद 1- 2 दिन का विश्राम ले सकते हैं. इससे आपके शरीर में उभरे सभी प्रकार के तनाव गायब हो जातें हैं और आप गायकी की रियाज़ की मेहनत जारी रखने के लिए फिर से, पहले से भी ज्यादा मजबूती से तैयार हो जाते हैं.
9) रियाज़ में जितना खुद अभ्यास करने की मान्यता है, उतना ही अच्छे संगीत को सुनाने की भी महत्ता है. इसलिए, जितना हो सके अच्छे अच्छे शास्त्रीय संगीत के गायकों को सुने, चाहे इंटरनेट पे सुने, या CD में सुने. संगीत को सुनने और उसको मन में ढालने से आपकी सोंच तैयार होती है.
10) रियाज़ में अपनी शारीरिक क्षमता को सम्पूर्ण रूप से तैयार करने के लिए एक और राज़ - रोजाना कम से कम ३० मिनट प्राणायाम, अगर आप कर सकें. गाते समय अलग अलग सप्तक शरीर के चार अलग अलग भाग पर जोर डालते है - पेट, फेफड़े, गला और सर का ऊपरी हिस्सा. अगर आप रोजाना भस्त्रिका, भ्रमरी और कपालभाती करें तो अपने आप में चमत्कारी परिवर्तन महसूस कर सकते हैं. एक सिर्फ कहने की बात नहीं है, खुद करके देखिये और मुझे बताईये कि चमत्कार हुआ कि नहीं.
11) एक आखिरी बात. इस बात का ध्यान रखें की रियाज़ करने के लिए आपने अपनी दिनचर्या को बहुत कष्टकारी, तनावपूर्ण और असहज न बना दिया हो. ऐसा कर के रियाज़ करने से सफलता नहीं मिलती इसलिए ये बहुत जरूरी है कि आप संगीत सीखने के साथ साथ जीवन में बाकी चीजों के साथ संतुलन और सहजता बनाये रखें.

गायकी और गले का रख-रखाव

एक गायक के लिए गला भगवान का दिया हुआ एक प्राकृतिक वाद्ययंत्र है जो बड़ी बखूबी से संगीत की ऐसी ऐसी ध्वनियों की प्रस्तुति कर सकता है जो किसी और इंसान के बनाए हुए वाद्ययंत्र के लिए संभव नहीं है. अच्छी सुरीली आवाज़ ईश्वर की दें है और इसलिए गायकी की चाह रखने वाले लोगों को, खासकर कलाकारों को अपने गले का अनिवार्य रूप से अपने गले का ध्यान रखना चाहिए. बहुत से बड़े बड़े गायक कलाकार और संगीतकार हैं जो विचारपूर्वक ध्यान रखते भी हैं. आइये जानें कि संगीत और सुर की साधना के साथ साथ गले का ध्यान कैसे रखा जाये ताकि बेहतर से बेहतर गायकी की ऊंचाईयों को छुआ जा सके. 
  1. शुरू करते हैं सबसे महत्वपूर्ण बात से - पानी। गले को अच्छे तरीके से  काम करने के लिए गले का तर रहना बहुत ही जरूरी है. इसलिए नियम से दिन भर में आठ से दस गिलास पानी जरूर पिएं, चाहे प्यास लगे या नहीं. अगर आप बैंगलोर जैसे शहर में हैं तो मौसम की वजह से प्यास  कम ही लगती है. लेकिन, फिर भी, अगर आप गायन की संगीत साधना के लिए गम्भीर हैं तो पानी बराबर से पीते रहिये। पानी गायक के लिए पूरा पूरा अमृत है, वो भी लगभग बिलकुल मुफ्त का.  
  2. अब आते हैं खाने पर. खाने-पीने में बहुत मसालेदार खाने से थोड़ा दूर रहें. तला भुना खाना भी काम ही रखें. अक्सर ऐसा देखा गया है कि खाने पीने में संयम न बरतने से पेट के एसिड का बहाव उल्टा होने लगता है, पेट से गले की तरफ. गले में ये एसिड धीरे धीरे जम के जलन और खांसी की समस्या खड़ी कर देता है जो कि गायक के लिए बड़ी परेशानी बन सकती है. इसलिए, अगर एक दम ही सादे खाने पर न आएं मगर खूब मसालेदार और चटपटे खाने को भी रोज का हिसाब न बनाए, संयम रखें। इससे गले के रख रखाव में बड़ी मदद होगी. वैसे तो अगर आपको चाय की आदत है तो छोड़ना मुश्किल ही है लेकिन अगर संभव है तो चाय की जगह गुनगुने पानी में नीम्बूरस और शहद मिलकर लें, चाहें तो दो चार पुदीने की पत्तियां डाल लें. दो तीन महीने कर के देखिये, फायदा खुद महसूस होने लगेगा। 
  3. कॉफ़ी और अल्कोहल ड्रिंक्स  - ये दोनों आपके गले के पक्के (पक्के मतलब वाकई पक्के) दुश्मन हैं. इसकी वजह है कि कॉफी और अल्कोहल ड्रिंक्स ये दोनों ही आपके शरीर से पानी निकालते हैं और गले में सूखापन लाते हैं. इसीलिए अगर आप अगर अपनी संगीत साधना को लेकर गम्भीर हैं तो कॉफी और अल्कोहल ड्रिंक्स से कोसों दूर रहें. 
  4. अगर आप को mouthwash / gargle (गरारा/कुल्ला) करने की सलाह दी गयी है या फिर आप गले को स्वस्थ रखने के लिए करना चाहते हैं तो जहाँ तक संभव हो अल्कोहल वाले या फिर chemical वाले mouthwash का प्रयोग न करें. chemical दवाओं का प्रयोग तो बिलकुल भी न करें. इससे गले की सतह प्रभावित होती है. करना ही है तो पानी गुनगुना कर के, थोड़ा नमक मिला कर फिर कुल्ला/ गरारा करें, इससे गले की सफाई तो होगी ही, गले को कोई नुकसान भी नहीं होगा. 
  5. गले की उत्तम प्रकृति को बनाए रखने के लिए जरूरी है की उसे धुएं से बचाया जाये. धूम्रपान करना या फिर सिगरेट / बीड़ी के धुएं के आसपास रहना, दोनों ही गले की आवाज़ बनाने वाली झिल्ली (vocal folds) को खुरदरा बना देता हैं, आवाज़ की रेंज को घटाता है और सबसे जरूरी बात ये कि धूम्रपान से होने वाला नुकसान स्थायी हो जाता है जिसे सुधारना लगभग असम्भव ही होता है. 
  6. आम आदमी के गला एक बस सामान्य सा शरीर का हिस्सा है जो उन्हें उनकी पहचान वाली आवाज़ देता है. रोजाना की जिंदगी में आम आदमी का गले पर कोई खास ध्यान नहीं जाता। लेकिन गायकी के कलाकार के लिए गला उनकी कला का सर्वोच्च और सबसे महत्वपूर्ण साधन है, यन्त्र है. इसीलिए गायक के लिए आवश्यक है कि रोजमर्रा की बातों में, रियाज़ करते समय और संगीत प्रस्तुतियों में गले पर बहुत जोर न पड़े. आम बात चीत में बहुत ज्यादा चिल्लाना और तेज आवाज़ में बात करना धीरे धीरे गले की पेशियों को सुरों की नाजुक महीन उतार चढाव को सँभालने में अक्षम करने लगता है. इसी तरीके से, रियाज़ करते समय इस बात का ध्यान रखें कि गले पर बहुत जोर न पड़े. जब गाने का अभ्यास करते करते गले में थोड़ा दर्द महसूस हो या फिर तनाव महसूस हो तो गले को आराम दें, रियाज़ से ब्रेक लें और जब तक गला फिर से आराम के साथ दुबारा मेहनत के लिए तैयार न हो, तब तक दुबारा अभ्यास न करें. गले को एक रबरबैंड की तरह समझें. अपनी हद समझें और जरूरत से ज्यादा न खींचे नहीं तो स्थायी रूप से नुक्सान हो सकता है. 
  7. गायकों के साथ एक और बात देखी गयी है. गले में थोड़ा खराश होने से वो बार बार गले को जोर से खरखराहट के साथ साफ़ करते रहते हैं. ये अच्छी आदत नहीं है. ऐसा करने से गले में और ज्यादा उत्तेजना पैदा होती है और साथ ही गला प्राकृतिक रूप से और ज्यादा कफ पैदा करता है. ख़राश को साफ़ करने के लिए सबसे अच्छा तरीका है पूरी तरीके से खाँसना। जब भी गले में ख़राश हो तो बार बार गला साफ करने की बजाय थोड़ा खांस लें. अब बात तो ये छोटी सी ही है लेकिन जो संगीत साधना में महारथ रखते हैं, वो जानते हैं कि ये कितनी महत्वपूर्ण हैं. 
  8. नींद - आज के ज़माने में बहुत कम ऐसी खुशकिस्मत हैं जिन्हे अच्छी पूरी नींद का आशीर्वाद मिला हैं.  वरना तो भागम-भाग में आधी अधूरी नींद और लगातार शरीर में बनी हुई थकावट एक आम बात है. इसलिए गायक को जब भी मौका मिले, भरपूर आराम करें, पूरे रात भर की नींद लें और जितना हो सके थकावट दूर करें. ज्यादातर लोगों को नींद के महत्त्व के बारे में कम ही पता है. जब हम सोते हैं तो यही समय होता है जब भगवान की बनायी हुई इस मशीन की मरम्मत होती है. अगर हम सात घंटे से कम की नींद लेते हैं तो शरीर की मरम्मत ठीक तरह से नहीं होती है और धीरे धीरे इसका गायकी की क्षमता, एकाग्रता (कन्सेंट्रेसन) और गले की रेंज पर भारी असर होने लगता है. अब इससे ज्यादा नींद की अहमियत के बारे में और क्या कहा जा सकता है. 
  9. अब इस कड़ी की आखिरी बात - बड़े बड़े शास्त्रीय संगीत के गायकों का एक बड़ा राज़ ये है कि वो किसी भी रियाज़ या संगीत प्रस्तुति के पहले अपने गले को 'वार्म अप'  करते हैं. वार्म अप का मतलब थोड़ा सांसों की एक्सरसाइज (प्राणायाम), थोड़ी देर नीचे सुरों पर गुनगुनाना, थोड़ा सरगम का रियाज़ और फिर उसके बाद ही ऊंची रेंज या बुलंद आवाज़ वाली गायकी. तो इसलिए जब भी सुर साधना शुरू करें तो थोड़ा गले का वार्म अप कर लें. 
उम्मीद है कि इस नयी जानकारी से गायकी की रूचि रखने वाले सभी संगीत प्रेमियों को सहायता मिलेगी. धन्यवाद. 

कैसे मशहूर गायक बनें



दृढ़ निश्चयी तथा सख्त बने रहें: बाहर की दुनिया में बहुत अधिक स्पर्धा है - हजारों लोग एक सफल गायन पेशे की प्रसिद्धि और वैभव पाना चाहते है। सफल बनने के पहले अधिकांश गायक अपने आवाज पर काम करने के लिए सालो लगा देते हैं, तथा कम पैसों में अपना काम चलाते है। अपने लक्ष्य से दृष्टि ना हटने दें और अपनी सहनशीलता बनाये रखें।


डर पर जीत हासिल करें: आप जैसा सोचते है उसके विपरीत, बहुत सारे कलाकार मंच से भय के साथ संघर्ष करते है। यदि यह आपकी समस्या है, या फिर दूसरों की पसंद में बनने में आपको दिक्कते आ रही है, तो अपने डर का सामना करने तथा अपना आत्मविश्वास बढ़ाने के तरीके खोजें। अक्सर दूसरों के सामने गाते रहें, चाहे दोस्तों के साथ कार में हो या फिर मंच पर, और एक बात हमेशा याद रखिये, दूसरों की आपके बारे में राय मायने नहीं रखती - आप अपने सपने साकार करने के लिए काम कर रहे हो यही मायने रखता है।


एक अच्छे गाने से शुरुआत करे जो आप अच्छे से गा सकते हैं: एक बार जब यह गाना आप अच्छे से गाना शुरू कर लेंगे, इसके बाद अगले गाने पर कार्य करे, यह सब करते हुए आपको पता भी नहीं चलेगा और आपके पास रात भर गाने के लिए एक विस्तृत सूची होगी।


सांस लें, गहरी सांस लें, गाना गाने के लिए अधिक सांस की जरूरत होती है: इसलिए सांस और ऊर्जा की कमी ना होने दें।


यदि आप अपने गाने खुद नहीं लिखते है तो अच्छे गीतों का चुनाव करें: बहुत सारे गायक अपने गाने खुद नहीं लिखते है और यह सामान्य हैं। खासकर आपके शुरुआती दिनों में आप चाहेंगे कि लोग आपकी गीत लिखने की गुणवत्ता से अधिक आपकी आवाज की तरफ ज्यादा ध्यान दें। ऐसे गाने चुने जिनसे आपको पूरी अपेक्षा है कि आप छा जायेंगे और लोगों को पसंद आएंगे। ऐसे 10 से 15 गानों की एक "सूची" बनायें और उनको अधिक अच्छा बनाने के लिए अच्छी तरह से अभ्यास करें।
  • लोकप्रिय और अस्पष्ट गीतों का एक अच्छा मिश्रण चुनें। सिर्फ लोकप्रिय 40 गीत नहीं चुनने है और ना ही आपको ऐसे गाने चुनने चाहिए को ज्यादा सुने नहीं गए हो और जिनके बारे में लोग ज्यादा नहीं जानते हैं।
  • क्लासिक गीतों को थोड़ा नया मोड़ दें। अपनी गायकी की तरफ लोगों का ध्यान खींचने का अचानक से गाने स्वर, गति या संगीत में बदलाव लाना यह एक अच्छा तरीका है। "हालिलुजाय" के कई अलग अलग संस्करणों की तुलना करें, या फिर माइकल जैक्सन के सिविल वार कवर के "बिली जीन" सुनिए।

जब भी संभव हो जनता के बीच गाये: आप की आवाज लोगों तक पहुँचाने के लिए जितना अधिक हो सके लोगो के बीच गाने गाइए - क्या पता आपके दर्शकों के बीच आपको कौन सुन रहा हैं। निजी पार्टियों, काउंटी मेलों, दुकान के आरंभ, रेडियो, खेल की स्पर्धाएँ, प्रतिभा शोज, कराओके नाइट्स, और जहाँ भी मौका मिले, पैसे मिले ना मिले वहां पर गायें। अगर आपको टैलेंट एजेंट द्वारा सराहा नहीं किया जाता है, फिर भी आपको लोगों के सामने मंच पर अभ्यास करने का मौका मिलता रहता है।


एक यूट्यूब चैनल शुरू करें: यूट्यूब के माध्यम से खुद के गायन के विडियो पोस्ट करके कुछ लोगों सही में प्रसिद्धि पाने में कामयाब रहे हैं (श्रद्धा शर्मा, अनिरुद्ध रविचन्दर, प्रतीक कुहाद और खास करके जस्टिन बीबर को ही देख लें)।
  • याद रहे- इंटरनेट हमेशा एक सज्जनता पूर्ण स्थान नहीं है। यदि आपको नहीं लगता है कि आपकी आवाज इतनी अच्छा नहीं है तो कुछ और प्रशिक्षण लेने तक रुक जाना एक अच्छा विचार होगा। आपको ऑनलाइन वाहवाही तो मिल सकती है, लेकिन आपका कुछ ऐसे लोगों से भी सामना हो सकता है जो आपको नीचे खींचने के लिए बैठे हैं।
  • इसके अतिरिक्त, आपको इस चीज का भी ध्यान रखना होगा, आप जो भी ऑनलाइन पोस्ट करते हो वो हमेशा के लिए इंटरनेट पर अबाधित रहता है। हमेशा ऐसे कंटेंट पोस्ट कीजिये जिस पर आप गर्व महसूस करते है और 10 साल बाद भी आप उस पर गर्व महसूस कर सकेंगे।
  • "अगर आप वयस्क है तो यूट्यूब पर पोस्ट न करें"। अगर आप नाबालिग है, तो आपके माता-पिता में से एक को आपका कंटेंट पोस्ट करने के लिए कहें।

प्रसिद्धि पाने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहें: खाते, सांस लेते, सोते समय चारों ओर ध्यान रखें। तस्वीर खिंचवाने के अवसर बनाये। अपनी बात कहते रहें, सुर्ख़ियों प्राप्त करने का कोई भी मौका ना गंवाएं। अपने आपको लोगो के जहन में बनायें।


नेटवर्क: सफल संगीतकार/ निर्माता जहां मिलते है ऐसे स्थानों (क्लब, डांस हॉल्स) में जाते रहें, और अगर वो आपको जानते ना भी हो, फिर भी इस तरह का व्यवहार करें जैसे आप उनमे से ही एक हैं। ऐसे शहरों के लिए जाएँ जो संगीत के लिए जाने जाते हो (जैसे मुम्बई, दिल्ली इत्यादि) और स्थानीय संगीतकारों के साथ घुल मिल जाएं।
  • अन्य संगीतकारों के साथ संबंध बनायें। आपके साथ भविष्य में कौन सहयोग बनाना चाहता है, या किसी एजेंट से मिले। स्नेहशील बनने तथा दूसरे व्यक्तियों के कैरियर में रूचि बनाने के लिए समय निकाले।

हमेशा अपना सर्वश्रेष्ठ दिखायें: आप मंच पर या इंडस्ट्री के लोगों के साथ नेटवर्किंग कर रहे है, उनको आकर्षित करने की कोशिश करें। अगर आपको अजीब लगें फिर भी, मुस्कुराए, सवालों के जवाब दें और उत्साह के साथ गाते रहें। मनोरंजन के दुनिया में काम करने का एक हिस्सा होता है, जैसे लाइट का स्विच चालू बंद करने की तरह ही ऊर्जा भरा मजेदार माहौल तैयार करने के लिए तैयार रहें।
  • अपने प्रशंसकों के बीच ऐसी कोई जैसे कि आप बड़े मशहूर बन गए हो यह जताने वाली हरकत न करें। याद रहे आप के प्रशंसक आपको बदनामी के अंधकार में भी ढकेल सकते है। प्रशंसकों के लिए ऑटोग्राफ दें, सवालों के जवाब दें तथा आपने शो के बाद उनके साथ तस्वीरें खिंचवाये।

आलोचना संभालना सीखें: जी हाँ, ऐसा होता है - चाहे आप कितने भी अच्छे गायक हो, कुछ लोग आपकी आवाज पसंद नहीं करेंगे। यहां तक की विश्व प्रसिद्ध गायकों को नापसंद करने वाले भी बहुत से लोग हैं। अगर अपनी प्रतिभा को बेहतर बनाने में मदद करें, तो रचनात्मक आलोचना की तरफ ध्यान दें; अन्यथा, उसे नजरअंदाज कर दें। अपने सपनों के बारे में बहस या झगड़े में न पड़ें, तंग करने वालों से दूर रहें - वो सिर्फ आपसे जलने वाले लोग होते है।


अस्वीकृति को स्वीकार करें और आगे बढ़ें: यह सामान्य ज्ञान नहीं है, बहुत सारे बड़े संगीत शो शुरुआत होने के पहले ही बंद कर दिये गए थे, इसमे बीटल्स भी शामिल है। अगर कोई आपके साथ काम करना नहीं चाहता है, यह उनका नुकसान है - अगले अवसर की तरफ बढ़े और अपना सर हमेशा ऊंचा रखें।


एक बैंड के साथ शामिल होने पर विचार करें (वैकल्पिक): अगर   आप कोई वाद्य नहीं बजाते है, तो एक बैंड जो आपको संगीत दे उसमे शामिल होना सहीं रहेगा। हालांकि, आप एक बैंड के सदस्य हो, इसकी जानकारी रखे कि आप अपनी सफलता की साझा करने के लिए बाध्य है -आप स्वार्थी बनके अकेले कार्यक्रम नहीं कर सकते हैं। निर्णय लेने से पहले इसके फायदे और नुकसान को अच्छी तरह से जान लें।



Friday, October 20, 2017

स्वर

संगीत में वह शब्द जिसका कोई निश्चित रूप हो और जिसकी कोमलता या तीव्रता अथवा उतार-चढ़ाव आदि का, सुनते ही, सहज में अनुमान हो सके, स्वर कहलाता है। भारतीय संगीत में सात स्वर (notes of the scale) हैं, जिनके नाम हैं - षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत व निषाद।
यों तो स्वरों की कोई संख्या बतलाई ही नहीं जा सकती, परंतु फिर भी सुविधा के लिये सभी देशों और सभी कालों में सात स्वर नियत किए गए हैं। भारत में इन सातों स्वरों के नाम क्रम से षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद रखे गए हैं जिनके संक्षिप्त रूप सा, रे ग, म, प, ध और नि हैं।
वैज्ञानिकों ने परीक्षा करके सिद्ध किया है कि किसी पदार्थ में २५६ बार कंप होने पर षड्ज, २९८ २/३ बार कंप होने पर ऋषभ, ३२० बार कंप होने पर गांधार स्वर उत्पन्न होता है; और इसी प्रकार बढ़ते बढ़ते ४८० बार कंप होने पर निषाद स्वर निकलता है। तात्पर्य यह कि कंपन जितना ही अधिक और जल्दी जल्दी होता है, स्वर भी उतना ही ऊँचा चढ़ता जाता है। इस क्रम के अनुसार षड्ज से निषाद तक सातों स्वरों के समूह को सप्तक कहते हैं। एक सप्तक के उपरांत दूसरा सप्तक चलता है, जिसके स्वरों की कंपनसंख्या इस संख्या से दूनी होती है। इसी प्रकार तीसरा और चौथा सप्तक भी होता है। यदि प्रत्येक स्वर की कपनसंख्या नियत से आधी हो, तो स्वर बराबर नीचे होते जायँगे और उन स्वरों का समूह नीचे का सप्तक कहलाएगा।
भारत में यह भी माना गया है कि ये सातों स्वर क्रमशः मोर, गौ, बकरी, क्रौंच, कोयल, घोड़े और हाथी के स्वर से लिए गए हैं, अर्थात् ये सब प्राणी क्रमशः इन्हीं स्वरों में बोलते हैं; और इन्हीं के अनुकरण पर स्वरों की यह संख्या नियत की गई है। भिन्न भिन्न स्वरों के उच्चारण स्थान भी भिन्न भिन्न कहे गए हैं। जैसे,—नासा, कंठ, उर, तालु, जीभ और दाँत इन छह स्थानों में उत्पन्न होने के कारण पहला स्वर षड्ज कहलाता है। जिस स्वर की गति नाभि से सिर तक पहुँचे, वह ऋषभ कहलाता है, आदि। ये सब स्वर गले से तो निकलते ही हैं, पर बाजों से भी उसी प्रकार निकलते है। इन सातों में से सा और प तो शुद्ध स्वर कहलते हैं, क्योंकि इनका कोई भेद नहीं होता; पर शेष पाचों स्वर दो प्रकार के होते हैं - कोमल और तीव्र। प्रत्येक स्वर दो दो, तीन तीन भागों में बंटा रहता हैं, जिनमें से प्रत्येक भाग 'श्रुति' कहलाता है।

परिचय

विद्वानों ने माना है कि जो ध्वनियाँ निश्चित ताल और लय में होती हैं वहीं संगीत पैदा करती हैं। ध्वनियों के मोटे तौर पर दो प्रकार ‘आहत’ और ‘अनाहत’ ध्वनियाँ संगीत के लिए उपयोगी नहीं होतीं, इनका अनुभव ध्यान की परावस्था में होता है अतः ‘आहत’ नाद से ही संगीत का जन्म होता है। यह नाद दो वस्तुओं को आपस में रगड़ने, घर्षण या एक पर दूसरी वस्तु के प्रहार में पैदा होता है। ‘आहत’ नाद हम तक कंपन के माध्यम से पहुँचता है। ध्वनि अपनी तरंगों से हवा में हलचल पैदा करती है। ध्वनि तरंगों की चौ़ड़ाई और लम्बाई पर ध्वनि का ऊँचा या नीचा होना तय होता है। संगीत के सात स्वरों में ‘रे’ का नाद ‘सा’ के नाद से ऊँचा है। इसी तरह ‘ग’ का नाद ‘रे’ से ऊँचा है। यह भी कह सकते हैं कि ‘ग’ की ध्वनि में तरंगों की लम्बाई ‘रे’ की ध्वनि–तरंगों से कम है और कम्पनों की संख्या ‘रे’ की तुलना में ज्यादा है। इसके अलावा ध्वनि से सम्बन्धित और भी कई सिद्धान्त हैं जो ध्वनि का भारी या पतला होना, देर या कम देर तक सुनाई देना निश्चित करते हैं। इन्हीं गुणों को ध्यान में रखते हुए संगीत के लिए मुख्यतः सात स्वर निश्चित किये गए। षड्ज, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत व निषाद स्वर-नामों के पहले अक्षर लेकर इन्हें सा, रे ग, म, प, ध और नि कहा गया। ये सब शुद्ध स्वर है। इनमें ‘सा’ और ‘प’ अचल माने गये हैं क्योंकि ये अपनी जगह से जरा भी नहीं हटते। बाकी पाँच स्वरों को विकृत या विकारी स्वर भी कहते हैं, क्योंकि इनमें अपने स्थान से हटने की गुंजाइश होती है। कोई स्वर अपने नियत स्थान से थो़ड़ा नीचे खिसकता है तो वह कोमल स्वर कहलाता है। और ऊपर खिसकता है तो तीव्र स्वर हो जाता है। फिर अपने स्थान पर लौट आने पर ये स्वर शुद्ध कहे जाते हैं। रे, ग, ध, नि जब नीचे खिसकते हैं तब वे कोमल बन जाते हैं और ‘म’ ऊपर पहुँचकर तीव्र बन जाता है। इस तरह सात शुद्ध स्वर, चार कोमल और एक तीव्र मिलकर बारह स्वर तैयार होते हैं।
सात स्वरों को ‘सप्तक’ कहा गया है, लेकिन ध्वनि की ऊँचाई और नीचाई के आधार पर संगीत में तीन तरह के सप्तक माने गये। साधारण ध्वनि को ‘मध्य’, मध्य से ऊपर की ध्वनि को ‘तार’ और मध्य से नीचे की ध्वनि को ‘मन्द्र’ सप्तक कहा जाता है। ‘तार सप्तक’ में तालू, ‘मध्य सप्तक’ में गला और ‘मन्द्र सप्तक’ में हृदय पर जोर पड़ता है। संगीत के आधुनिक-काल के महान संगीतज्ञों पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर और पण्डित विष्णुनारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत परम्परा को लिखने की पद्धित विकसित की। भातखण्डे जी ने सप्तकों के स्वरों को लिखने के लिए बिन्दु का प्रयोग किया। स्वर के ऊपर बिन्दु तार सप्तक, स्वर के नीचे बिन्दु मन्द्र सप्तक और बिन्दु रहित स्वर मध्य सप्तक दर्शाते हैं। इन सप्तकों में कोमल और तीव्र स्वर भी गाये जाते हैं, जिन्हें भातखण्डे लिपि में स्वरों के ऊपर खड़ी पाई (म) लगाकर तीव्र तथा स्वरों के नीचे पट पाई (ग) लगाकर कोमल दर्शाया जाता है। इन स्वरों की ध्वनि का केवल स्तर बदलता है। इनकी कोमलता और तीव्रता बनी रहती है।Click Here
संगीत में स्वर को लय में निबद्ध होना पड़ता है। लय भी सप्तकों की तरह तीन स्तर से गुजरती है जैसे सामान्य लय को ‘मध्य लय,’ सामान्य से तेज लय को ‘द्रुत लय’ तथा सामान्य से कम को ‘विलिम्बित लय’ कहा जाता है। संगीत में समय को बराबर मात्राओं में बाँटने पर ‘ताल’ बनता है। ‘ताल’ बार-बार दोहराया जाता है और हर बार अपने अन्तिम टुक़ड़े को पूरा कर समय के जिस टुकड़े से शुरू हुआ था उसी पर आकर मिलता है। हर टुकड़े को ‘मात्रा’ कहा जाता है। संगीत में समय को मात्रा से मापा जाता है। तीन ताल में समय या लय के 16 टुकड़ें या मात्राएँ होती हैं। हर टुकड़े को एक नाम दिया जाता है, जिसे ‘बोल’ कहते हैं। इन्हीं बोलों को जब वाद्य पर बजाया जाता है तो उन्हें ‘ठेका’ कहते हैं। ‘ताल’ की मात्राओं को विभिन्न भागों में बाँटा जाता है, जिससे गाने या बजाने वाले को यह मालूम रहे कि वह कौन सी मात्रा पर है और कितनी मात्राओं के बाद वह ‘सम’ पर पहुँचेगा। तालों में बोलों के छंद के हिसाब से उनके विभाग किए जाते हैं। जहाँ से चक्र दोबारा शुरू होता है उसे ‘सम’ कहा जाता है। ‘ताल’ में ‘खाली’ 'भरी' दो महत्त्वपूर्ण शब्द हैं। ‘ताल’ के उस भाग को भरी कहते हैं जिस पर बोल के हिसाब से अधिक बल देना है। ‘भरी पर ताली दी जाती हैं। ‘ताल’ में खाली उम भाग को कहते हैं जिस पर ताली नहीं दी जाती और जिससे गायक को सम के आने का आभास हो जाता है। ताल लय को गाँठता है और उसे अपने नियंत्रण में रखता है।

सरगम का जबरन रियाज बिगाड़ रहा बच्चों की आवाज

रियलिटी शो के आडीशन में हिट होने की कोशिश में बच्चों से अभिभावकों और आयोजकों द्वारा करवाया जा रहा जबरन रियाज काफी नुकसानदेह साबित हो रहा...